Shri Swami Narottamanand Giri Ved Vidyalaya
श्री स्वामी नरोत्तमानंद गिरि वेद विद्यालय
चत्वारो वेदाः साङ्गा सरहस्या बहुधा भिन्नाः एकशतमध्वर्युशाखाः।
सहस्रवर्त्मा सामवेदः एकविंशतिधा बाह्वृच्यम्, नवधाऽथर्वणो वेदः।।
The four Vedas, along with their auxiliary disciplines and esoteric knowledge, are divided into many branches. The Yajurveda has 101 branches, the Samaveda has 1,000 branches, the Rigveda has 21 branches, and the Atharvaveda has 9 branches.
हमारे वेद विद्यालय में आपका स्वागत है
प्राचीन वैदिक ज्ञान, गुरु-शिष्य परंपरा एवं आधुनिक शिक्षा के समन्वय से विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास की दिशा में समर्पित एक विशिष्ट गुरुकुल।
एक परिचय
श्री स्वामी नरोत्तमानन्द गिरि वेद विद्यालय वैदिक शिक्षा, संस्कृत एवं आधुनिक विषयों के समन्वय के साथ विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए समर्पित गुरुकुल परंपरा पर आधारित शिक्षण संस्था है।
इतिहास एवं स्थापना
विद्यालय की स्थापना गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर 07 जुलाई 1999 को ब्रह्मलीन श्री 108 स्वामी शारदानन्द गिरि जी महाराज द्वारा अपने गुरु ब्रह्मलीन श्री स्वामी नरोत्तमानन्द गिरि जी महाराज की स्मृति में की गई।
सांस्कृतिक एवं समग्र विकास
यहाँ विद्यार्थियों को वेद अध्ययन के साथ खेल-कूद, योग, ध्यान, पेंटिंग, बागवानी तथा अन्य व्यावहारिक गतिविधियों के माध्यम से शारीरिक, मानसिक एवं सांस्कृतिक विकास का अवसर प्रदान किया जाता है।
आधुनिक शिक्षा एवं सुविधाएँ
वैदिक शिक्षा के साथ विद्यार्थियों को संस्कृत, अंग्रेजी, गणित, सामाजिक विषयों एवं कंप्यूटर का अध्ययन कराया जाता है, जिससे वे प्राचीन परंपरा के साथ आधुनिक ज्ञान से भी परिचित हो सकें।
वैदिक सस्वर उच्चारण परंपरा
वेद विद्या की मूल श्रुति परंपरा में गुरु के मुख से मंत्रों को सुनकर, उनका अनुकरण करते हुए बार-बार अभ्यास एवं आवृत्ति द्वारा विद्यार्थियों को वेद मंत्रों का शुद्ध उच्चारण एवं स्मरण कराया जाता है।
संयमित एवं सात्त्विक आहार
विद्यार्थियों के लिए विद्यालय की पाकशाला में निर्धारित मीनू के अनुसार पौष्टिक एवं सात्त्विक भोजन तैयार किया जाता है, जिसमें मौसमी सब्जियाँ, दालें, फल एवं अन्य पौष्टिक आहार सम्मिलित होते हैं।
परम पूज्य स्वामी विद्याधीशानन्द गिरि जी
अध्यक्ष परिचय
परम पूज्य स्वामी विद्याधीशानन्द गिरि जी एक उच्च पदस्थ वैदिक संन्यासी, प्रकांड विद्वान एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक हैं, जो प्राचीन हिमालयी ज्ञान और आधुनिक विश्व के बीच एक सेतु का कार्य कर रहे हैं।
आध्यात्मिक परंपरा: स्वामी जी आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित प्रतिष्ठित 'गिरि' संन्यास परंपरा से संबद्ध हैं। उन्हें गहन ध्यान-साधना, पारंपरिक संस्कृत पांडित्य और हिमालयी योग प्रणालियों के प्रामाणिक ज्ञान के लिए जाना जाता है।
संस्थापक एवं प्रमुख: वे हंसवेद मिशन (Hansavedas Mission) के प्रमुख हैं तथा संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में स्थित गैर-लाभकारी आध्यात्मिक संस्था 'सेल्फ इन्क्वायरी लाइफ फेलोशिप' (Self Enquiry Life Fellowship) के संस्थापक संन्यासी हैं।
दर्शन एवं उद्देश्य: स्वामी जी प्राचीन वैदिक ग्रंथों, उपनिषदों, क्रियायोग एवं ध्यान की गूढ़ परंपराओं को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करते हैं। उनका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर साधकों को आत्म-साक्षात्कार एवं समग्र जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करना है।